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सोमवार, 6 अप्रैल 2026

प्रयागराज अत्यंत प्रिय है मुझे

पिछले दिनों एक व्यक्तिगत प्रयोजन से मुझे प्रयागराज जाना हुआ। इस शहर की तासीर मुझे एक जादुई मोहपाश में बांध लेती है। मुझे लगता है कि मैंने अपने जीवन में जो कुछ भी अर्जित किया है वह इस तीर्थराज प्रयाग की ही देन है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक व परास्नातक की शिक्षा के बाद अल्पकालिक पत्रकारिता और फिर प्रतियोगी परीक्षा के माध्यम से राजकीय सेवा में चयन का गौरव इसी पावन भूमि पर मिला। कोषाधिकारी के रूप में यहाँ तैनाती हुई तो एक बार फिर लिखने-पढ़ने का सिलसिला नए सिरे से परवान चढ़ने लगा। ब्लॉगरी का नशा ऐसा चढ़ा कि देखते-देखते महाजाल के बड़े लिख्खाड़ों से परिचय हो गया। कई राष्ट्रीय स्तर के सेमिनार आयोजित करने का सौभाग्य मिला और हिंदुस्तानी एकेडमी के सौजन्य से मेरे ब्लॉग के भीतर से एक किताब भी छपकर आ गई। यह सब चमत्कार इसी प्रयागराज ने किया।

अस्तु आज भी जब मुझे प्रयागराज जाना होता है तो मैं यहाँ बहने वाली सरस्वती की धारा से एक तुष्टिकारक आचमन करने का लोभ संवरण नहीं कर पाता। इस बार भी मैं अत्यंत संक्षिप्त अवधि के बावजूद दो विभूतियों से मिला।

यूट्यूब पर सनातन संस्कृति और राष्ट्रवादी विचारधारा के प्रबल पैरोकार के रूप में प्रतिष्ठित अनुपम मिश्रा जी अपनी निष्पक्ष और निडर टिप्पणियों के लिए जाने जाते है। 'घूमता आइना' (@GhoomtaAaina_AnupamMishra) नाम से इनका बेहद लोकप्रिय यूट्यूब चैनल अपने दर्शकों से कोई सहयोग राशि नहीं मांगता। इसी चैनल पर रोज शाम को साढ़े आठ से नौ बजे के आसपास आप एक लाइव शो लेकर आते हैं जिसका नाम है - लोकतंत्र का नृत्य। राष्ट्रीय राजनीति से लेकर अंतरराष्ट्रीय घटनाओं तक और फिल्मों से लेकर खेल और मनोरंजन तक के विषयों की जैसी ज्ञानवर्धक और सरल समीक्षा आप करते हैं वह मंत्रमुग्ध कर देती है। अच्छे को अच्छा और बुरे को बुरा कहने का साहस आप में कूट-कूट कर भरा है। पॉलिटिकल करेक्टनेस का पाखंड आप नहीं पालते। वोकिज्म और सेकुलरिज्म का कीड़ा आपको बहुत खतरनाक लगता है जिससे बचने की सलाह आप देते रहते हैं। @scribe9104 ट्विटर (अब X ) पर आप की टिप्पणियाँ अक्सर वायरल हो जाती हैं। अनुपम जी से मात्र बीस-बाईस मिनट की भेंट ही मुझे समृद्ध कर गई।

रेलवे स्टेशन पर मैं गाड़ी आने से दस मिनट पहले ही पहुंच गया। यहाँ मुझे Hitesh Kumar Singh जी से मिलने की उम्मीद थी। अपनी रेलवे की व्यस्त नौकरी के साथ साथ वे साहित्य साधना में लगे रहते हैं। प्रयाग-पथ नाम से 'साहित्यिक कला और संस्कृति का संचयन' संपादित और प्रकाशित करते हैं। कुल पांच मिनट की भेंट में उन्होंने मुझे दिसंबर-२०२५ में प्रकाशित प्रयाग-पथ का कृष्णा सोबती पर केंद्रित जन्मशती विशेषांक भेंट किया। इसमें विभूतिनारायण राय का कृष्णा सोबती जी के संबंध में रोचक आलेख प्रमुखता से छपा है। दूसरे संस्मरण और समीक्षाएं भी है। एक संग्रहणीय अंक मेरे हाथ लगा है। आप भी इसे खोजकर पढ़िए। 

इन दो यादगार मुलाकातों की तस्वीर भी लगा देता हूँ। 'अहा इलाहाबाद' से 'प्रिय प्रयाग' तक मेरे लिए जादू है जादू।

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी




बुधवार, 25 मार्च 2026

साइकिल से सैर में शहद की मिठास

प्रातःकालीन योगासन व प्राणायाम के ऑनलाइन सत्र के बाद साइकिल से सैर का मन हुआ। सहारनपुर का मौसम आजकल शानदार है। ठंड जा चुकी है और गर्मी अभी आयी नहीं है। बागों में वाकई बहार है। पूरा वसंत है। अमराइयों में अब मंजरी से आम के टिकोरे बनने का मंजर है। खेतों में गेहूं की फसल पकने की तैयारी में है। हरा-भरा खेत अब सुनहले रंग में बदलने लगा है। जैसे प्रौढ़ावस्था में सिर के काले बाल सफेदी की यात्रा शुरू करते हैं तो उनका रंग खिचड़ी सा हो जाता है वैसे ही इस समय गेहूं  की अधपकी फसल हरे और सुनहले रंग की खिचड़ी सा कलेवर ले चुकी है। सरसो प्रायः पक चुकी है और काटी जाने को तैयार है। गन्ना अभी शैशवावस्था में है। इसकी निराई-गुड़ाई और सिंचाई का कार्य प्रगति पर है। पॉपलर की खेती यहाँ बहुत पॉपुलर है। खेत के खेत इसके सीधे खड़े लंबे-छरहरे पेड़ों से अटे पड़े हैं। प्लाईवुड उद्योग का कच्चा माल होता है पॉपलर। इन्हीं पॉपलर के खेतों में साथ-साथ गेहूं या गन्ना भी काट लिया जा रहा है।

सहारनपुर के देहात में उर्वरा भूमि की हरियाली देखते ही बनती है। यहां ग्रामीण क्षेत्र में भी अधिकांश सड़कें पक्की हैं। खेतों के बीच वाले चकरोडों पर भी प्रायः खड़ंजा लगा हुआ है। कच्ची सड़क कम ही मिलती है। साइकिल से सैर के लिए मैं खेतों के बीच गुजरती कच्ची सड़क या पगडंडी की तलाश में रहता हूँ। इस बार मैने विश्वविद्यालय परिसर से निकलकर पुंवारका से सुंदलहेड़ी की राह पकड़ी। सुंदलहेड़ी को पार करके सद्दामाजरा होते हुए घड़कौली की ओर जाने वाली पक्की सड़क पर पहले भी जा चुका हूँ। इस बाद सुंदलहेड़ी से आगे बढ़ा ही था कि बायीं ओर खेतों की ओर जाता एक चौड़ा खड़ंजा मार्ग दिखा। मैने साइकिल उस ओर मोड़ ली। खेतों की घनी हरियाली और फसलों की भीनी सुगंध के बीच मैं मस्त चाल से चलने लगा। यहां ताजा और शुद्ध ऑक्सीजन भरपूर थी।

पुराने खड़ंजे वाली इस सड़क पर ट्रैक्टर ट्रॉली के आवागमन से दो समानांतर नालियों जैसी रचना बन चुकी थी। खड़ंजा भी जहाँ तहाँ ऊबड़खाबड़ हो गया था। लेकिन साइकिल के लिए कोई खास दिक्कत नहीं थी। इसी पर सावधानी से एक दो किलोमीटर तक हिचकोले भरी यात्रा करने के बाद मुझे एक ओर पतली सड़क निकलती दिखाई दी। मैने फौरन उधर का रुख कर लिया।

इस चकरोड पर समकोण के मोड़ जल्दी जल्दी आ रहे थे। तीन-चार मोड़ पार करने के बाद मैने देखा एक खेत के किनारे दो लोग आग सुलगाकर बैठे हुए थे। मुझे आश्चर्य हुआ कि अच्छी-खासी धूप निकल चुकी है, फिर भी ये लोग आग जला रहे हैं। मैने सोचा शायद कुछ पकाने की तैयारी हो रही होगी। अपनी साइकिल को यथावत गति देता हुआ मैं आगे बढ़ गया। तिरछी नजरों से इतना देख पाया कि वहाँ कोई रसोई नहीं बन रही थी। उन दोनों में से एक नुकीली दाढ़ी वाले प्रौढ़ गृहस्थ थे तो दूसरा एक नौजवान था। उन दोनों ने भी मुझे हैरत से देखा था। मुझे अनुमान हुआ कि उनकी नजरें मेरा दूर तक पीछा करती रहीं। मैं उनकी आंखों से ओझल भी नहीं हो पाया था कि करीब तीन सौ मीटर आगे जाकर एक खेत के कोने पर वह चकरोड समाप्त हो गया। उसके आगे कच्ची पगडंडी थी जिसमें पानी भरा हुआ था। मजबूरन मुझे साइकिल वापस मोड़नी पड़ी। वे दोनों पहले से ही जानते थे कि मैं वापस आऊंगा ही। मेरे उनके पास आने पर नौजवान ने हास्य मिश्रित उत्साह से पूछा- कहां जाओगे जी?

मेरे पास इसका ठीक ठीक एक शब्द में उत्तर नहीं था। मैने अपनी स्थिति स्पष्ट की - यूँ ही साइकिल से घूमने निकला था। माँ शाकुंभरी यूनिवर्सिटी वापस जाने का रास्ता खोज रहा हूँ। इधर से लखनौती जाने वाली सड़क पर जाना चाहता था। इसके लिए शायद थोड़ा आगे जाकर मुड़ना था। लेकिन मैं पहले मुड़ गया और आप लोग मिल गए।

मैने गेहूं के हरे डंठल से बने गट्ठर में सुलगती आग की ओर देखते हुए इशारे में इसका प्रयोजन पूछना चाहा। तभी नौजवान ने एक पॉलीथिन आगे कर दी। इसमें शहद के छत्ते के छोटे-छोटे टुकड़े भरे हुए थे। मुझे समझते देर न लगी कि इन लोगों ने मधुमक्खी के छत्ते तोड़कर शहद निकालने का प्रयास किया है। हरे डंठल में आग सुलगाकर उसके धुएं से मधुमक्खियों को छत्ते से भगाया गया होगा और फिर उनके आशियाने को तोड़कर शहद निकालने की कोशिश की गई होगी। शहद का यह छत्ता खेत के कोने पर ट्यूबवेल की कोठरी के भीतर लगा हुआ था।

मुझे किसी अनुभवी की यह बात याद आई कि शहद निकालने का सही समय कृष्णपक्ष की अमावस्या से पूर्व का होता है। मधुमक्खियों द्वारा शुक्लपक्ष में शहद का ज्यादा उपभोग कर लिया जाता है क्योंकि उजाले में उनके चोरी हो जाने की संभावना रहती है। इसी क्रम में मुझे बताया गया था कि छत्ते में शहद की मात्रा कृष्णपक्ष में अधिक होती है और शुक्लपक्ष में कम। मैने इस मान्यता की पुष्टि के लिए पूछा- बस इतना ही मिला क्या?

नौजवान ने वहां रखी खाली बाल्टी दिखाते हुए कहा - मैं तो यह लाया था शहद ले जाने को लेकिन बहुत थोड़ा ही मिला। इस पन्नी में ही आ गया। फिर उसने पूछा - आप टेस्ट करोगे? उसने पॉलीथिन से एक टुकड़ा शहद का छत्ता निकाला और ध्यान से देखते हुए आश्वस्त किया कि इसमें कोई अंडा-बच्चा नहीं है। शुद्ध शहद ही है। इसे चूसकर देखो।

इस शहद भरे टुकड़े को मुँह में रखकर चूसने का मेरा पहला अनुभव बड़ा ही मीठा रहा। बहुत देर तक मुंह में शुद्ध शहद का स्वाद बना रहा। बाजार में बिकने वाले डिब्बाबंद शहद से बिल्कुल अलग।

उन लोगों ने पूरा परिचय जानने के बाद मुझे गाँव में चलने की दावत दी लेकिन मुझे तो अब लौटना था। समय से तैयार होकर ऑफिस में पहुंचना भी जरूरी था। मैने उनसे वापसी का रास्ता समझा और आगे बढ़ चला। आगे मुझे वह सीधी-सपाट और कच्ची सड़क मिली जो अल्हेड़ी गांव के बगल से होकर लखनौती जाने वाली पक्की सड़क पर पहुंचाती है। पक्की सड़क पर पहुंचते ही मुझे एक जनसेवा केंद्र जैसा कुछ दिखा जिसका साइनबोर्ड बता रहा था कि यहां से विदेश यात्रा संबंधी दस्तावेज बनवाने की सुविधा/ सेवा उपलब्ध कराई जाती है। कदाचित पासपोर्ट और बीजा बनवाने वाले कुछ लोग वहां जमा भी थे।

पक्की और गड्ढामुक्त सड़क मिली तो मेरी चाल भी तेज हो गई। आगे जो गांव मिला उसका नाम था- दतौली मुग़ल। इसके मुहाने पर आते ही सड़क की चौड़ाई आधी हो गई। थोड़ा और आगे बढ़ा तो बनारस की गलियां याद आने लगीं। थोड़ी ही देर में मुझे साइकिल रोकनी पड़ी क्योंकि आगे का रास्ता बेहद संकरा और किसी के घर में जाता हुआ जान पड़ा। वहीं एक घर से लोहे का गेट खोलकर एक लड़का निकला। बिना पूछे ही उसने मुझे उत्तर दिया - आप गलत आ गए हैं। पीछे लौटिए और उस टंकी के बगल से गांव के बाहर-बाहर होकर जाइए तो लखनौती की सड़क फिर मिल जाएगी।

मैने गांव के बाहरी सिरे पर खड़ी पानी की विशाल टंकी को लक्ष्य किया और उस संकरी गली से निकलकर चौड़ी सड़क पर आ गया। टंकी के पास ही बड़ा सा सोलर प्लांट भी लगा हुआ था और बिल्डिंग मटेरियल की बड़ी सी दुकान भी थी। खच्चर जुती हुई एक बग्घी पर सीमेंट की बोरियां लादी जा रही थीं। मैने झटपट टंकी के साथ एक सेल्फी ली। रुककर और फोटो खींचने का विचार मैने त्याग दिया। देर तो हो ही रही थी। इस गांव में अजनबी के रूप में गली - गली भटकते हुए मुझे कई नजरों ने देखा था। अब गांव की हलचल की फोटो खींचते देखकर कोई कुछ गलत समझ बैठे इससे पहले ही निकल लेना मुझे उचित लगा। खामखां रेकी करने का इल्ज़ाम क्यों लगवाता मैं।

हरे-भरे झूमते खेतों और आम के बागों के बीच दौड़ती सड़क से चलकर अंततः मैं लखनौती गांव के तिराहे पर आ गया। चायपान और किराना दुकानों की हलचल और ट्रैक्टर-ट्रॉली, मिनी ट्रक, ऑटोरिक्शा, ई-रिक्शा, बाइक, ठेला, खोमचा आदि की चिल्ल-पों और धूल धक्कड़ के बीच लौटकर मुझे लगा जैसे अचानक दुनिया ही बदल गई। तभी मुझे तीन-चार जोरदार छींकें आईं। उनसे पार पाकर नाक पोंछते हुए मैं अपने विश्वविद्यालय की ओर जाने वाले स्टेट हाईवे पर मुड़ गया।

घर पहुंचने पर दो जोड़ी चिंतातुर आंखे मेरी प्रतीक्षा करती मिलीं। चलते समय श्रीमती जी ने चेताया था कि तीन-चार किलोमीटर से ज्यादा मत चलाइएगा। लेकिन लौटने पर मेरी स्मार्ट वॉच ने 13.6 किलोमीटर का आंकड़ा दर्ज किया था।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
















बुधवार, 26 नवंबर 2025

संविधान दिवस की शुभकामनाएं

देश आज संविधान दिवस मना रहा है। आप सबको ढेरों बधाई और हार्दिक शुभकामनाएं।

वर्ष 2011में गणतंत्र दिवस के अवसर पर मैंने एक गीत लिखा था। करीब 15 वर्ष बाद आज मुझे स्थितियां कुछ कुछ बदली हुई महसूस हुई हैं। फलस्वरूप मैने उस गीत को थोड़ा संशोधित कर दिया है। मूल गीत का लिंक कमेंट में दे रहा हूं।

     हे संविधान जी नमस्कार,

हो गए छिहत्तर के फिर भी क्या कर पाये कुछ चमत्कार?

ऐ संविधान जी नमस्कार…

 

संप्रभु-समाजवादी-सेकुलर यह लोकतंत्र-जनगण अपना,

क्या पूरा कर पाये अब तक देखा जो गाँधी ने सपना?

बलिदानी अमर शहीदों ने क्या चाहा था बतलाते तुम

सबको समान दे आजादी, हो गयी कहाँ वह धारा गुम?

सिद्धांत बघारे बहुत मगर परिपालन में हो बेकरार,

हे संविधान जी नमस्कार…

 

बाबा साहब ने जुटा दिया दुनियाभर की अच्छी बातें,

दलितों पिछड़ों के लिए दिया धाराओं में भर सौगातें।

मौलिक अधिकारों की झोली लटकाकर चलते आप रहे;

स्तम्भ तीन जो खड़े किए वे अपना कद ही नाप रहे।

इक दूजे को धकियाने की ज्यों होड़ लगी है धुँआधार,

हे संविधान जी नमस्कार…

 

अब कार्यपालिका चलती है बस बुलडोजर के गर्जन से,

नौकरशाही का तालमेल है धन कुबेर के अर्जन से।

माफ़िया निरंकुश थे जो वे अब मिट्टी में मिल जाते हैं;

अब कोर्ट कचहरी जाए बिन लूले लंगड़े बन जाते हैं

यह त्वरित न्याय है या तेरा पन्ना होता है तार-तार  

हे संविधान जी नमस्कार…

 

कानून बनाने वाले जब कानून तोड़ते दिखते हैं,

संसद सदस्य या एम.एल.ए. सबका भविष्य यूँ लिखते हैं।

जन-गण की बात हवाई है, दकियानूसी, बेमानी है;

जनता के हाथों कुंजी तो बस पाँच वर्ष में आनी है?

अब हंगामा, तू-तू मैं-मैं से संसद होती जार-जार  ,

हे संविधान जी नमस्कार…

 

क्या न्याय पालिका अडिग खड़ी कर्तव्य वहन कर पाती है?

जूते उछालने वालों से क्या कुर्सी तनिक लजाती है?

क्या जिला कचहरी, तहसीलों में न्याय सुलभ हो पाया है?

क्या मजिस्ट्रेट से, मुंसिफ़ से यह भ्रष्ट तंत्र घबराया है?

अफ़सोस तुम्हारी देहरी पर जन-गण-मन करता इंतजार

हे संविधान जी नमस्कार…